यहाँ
स्वीकृत हैं
अमानवीयता,
क्षम्य है
अत्याचार,
मान्य है
घृणा-द्वेष.....
दबा कर रखना
अपनीआँखों का
छलकता स्नेह,
एकांत में पूंछना
मेरा हाल,
धीरे से करना
प्रीत की बातें
क्योंकि
अस्वीकृत,अक्षम्य,अमान्य है
इस सभ्य,सुसंस्कृत समाज में
श्रद्धा और समर्पण,
आलोचित और बहिष्कृत है
अपनत्व...
कि प्रेम में स्त्रियां
अब राधा,मीरा नहीं
कुछ और कहलाती हैं।
Wednesday, 30 August 2017
स्वीकृत है..
इंतज़ार की सुबह
मेरे इन्तजार की सुबह
खोलती है जब
सांझ का संदूक.....
उसमें बंद हसरतों की
बेजान देह पर रखी
मजबूरियों की स्याही
फ़ैल जाती है......
मैं बेचैन अंधेरों को
करारों के रंग से सजाती हूँ..
नया सूरज उगाने के लिए
रात के सीने पर फिर से
उम्मीदों के दिए जलाती हूँ..
उम्मीद
कोई तो डोर है जिससे बंधी है उम्मीदें
कोई वादा नहीं है फिर भी वास्ता तो है।
कभी आये या न आये ये अलग बातें हैं
मेरे दिल से उसके दिल तक रास्ता तो है।
ज़िन्दगी की किताब
ये कुछ नर्म,नाजुक,मासूम से ,
किलकता है इनमें बचपन मेरा..
शोख,महकते,लरजते हैं जो,
इनमें धड़कती है जवानी मेरी..
धुले-धुले,नम से हैं ये जो कुछ,
हिज्र की स्याही से लिखे गये हैं..
बेजान,कटे-फटे,बिखरे हैं ये ,
दुनियादारी की मार है इन पर...
वक़्त ने भर दिए हैं इतने पन्ने,
जिंदगी की किताब में अब तक..
आखिरी जो दो-चार बचे हैं कोरे,
तुम्हारी लिखावट के इंतज़ार में हैं।
मुस्कुराहट को..
सप्रयत्न मुस्कुराहट को
उदासी की प्रतीक्षा है..
बोझिल आँखों को
बरसने की इक्छा है..
घुटन कान लगाए है
मिले ठौर तो बिखर जाये..
मौन ताक में हैं
आवाज बने और बह जाए..
सिमट जाने को है बेकल
एकाकीपन का प्रवाह....
झूठा साहस खोजता है
एक दुर्बलता की थाह..
बरसों से अनवरत
मेरा मुझसे ही उपेक्षित है..
सुनो! कहाँ हो तुम??
तुम्हारा आसरा अपेक्षित है..
कि लोकाचार का बोझ
मुझसे नहीं सहा जाता..
मुझे मेरा होना है अब
और सा नहीं रहा जाता।
प्रेमिकाएं
प्रिय की आवाज सुन कर
तपती ज़मीन पर दौड़ जाती हैं
भूल जाती हैं पैरों की जलन
कि प्रेम में जले को क्या जलन...
भींगती हैं बारिश में
और याद नहीं रहता
भीगने का अहसास
कि प्रेम में तर-बतर को क्या भीगना..
न रुकती हैं रस्मों में
न बंधती हैं रिवाजों में
कोई कैसे कैद कर पाए
कि प्रेम की खुशबू कोई कैसे छुपाये..
प्रेम बना ही देता है
लड़कियों को 'प्रेमिकाएँ'..
और ये प्रेमिकाएँ रख देती हैं
देह के ताप को, भावों के द्रव को
और प्रीत की सुगंध को
गुलाबी कागजों में ,
फूल वाले लिफाफों में बंद कर,
अपने प्रेमियों के लिए......
वो छुपाती हैं अपने प्रेम-पत्र
अलमारियों में,तकियों में
और अक्सर अपनी किताबों में..
वो छुपाती हैं खुद से ही
अपना इतराना ,इठलाना,
छुपाती हैं सबकी निगाहों से
गालों का सुर्ख़ हो जाना,
छुपाती हैं मन का मचल जाना,
छुपाती हैं देह का सुन्दर हो जाना...
प्रेमिकाएँ प्रेम में
लैला या सोहनी हो जाना चाहतीं हैं,
दुनिया के बंधन तोड़ देना चाहती हैं
लेकिन शहर में बदनामी से,
मोहल्ले की अफवाहों से
घर की जग-हंसाई से
माँ-बाप की रुलाई से ही सकुच जाती हैं,
नयी-नयी बनी प्रेमिकाएँ
घर की आंगनों और
कमरे की दीवारों तक ही सिमट जाती हैं..
कभी न भेजे गए अपने प्रेम-पत्र
अपने सीने में दफ़न कर के,
किसी की प्रेमिकाएँ
प्रेम के बारे में पूछने पर
किसी और से कहती हैं-
"प्रेम..न..पहले कभी न हुआ..."
और प्रेम उनके जीवन में
बाद में भी कभी नहीं होता।
कविता प्रेम पर
विपर्यय सामाजिक दशा को देख
मन में आया
के ऐसे में भी कैसे
लिख पाते हैं लोग प्रेम??
कैसे रच पाते हैं काव्य??
मन के सगे हृदय ने
समझी भाई की बात और कहा-
प्रेम में देह उतनी ही
उपादेय और आकर्षक है
जितना ज्ञान के लिए
विद्यालय में सजाए गये
खिलौने और झूले.......
इनसे खेलना,इनमें झूलना
विद्यालय का उद्देश्य या अंत नहीं
दैहिक आकर्षण/ प्रेम भी
प्रेम का उद्देश्य और अंत नहीं...
प्रेम आरम्भ होना आवश्यक है
क्योंकि यही प्रेम उन्नत होकर
प्राप्त करता है आत्मिक गति,
विकसित करता है अपना स्वरुप..
एक देह से प्रारम्भ होकर
प्रेम समेट लेता है क्रमशः
परिवार,गाँव,देश और
सम्पूर्ण मानव जाति को...
प्रेम का ही विकास
और परावर्तन होता है
कि लोग बन जाते हैं-
बुद्ध,महावीर,भगतसिंह,और टेरेसा...
तो नफरत लिखने से अच्छा है
लिखें प्रेम और बो दें कुछ बीज
सम्भवतः उनमें से निकल आएं
कुछ बट बृक्ष और विश्रांति दें
असंवेदनशीलता और अमानवीयता को।
तुम्हारा प्रेम
तुम्हारे प्रेम की
धूपिया स्पर्श से
मेरे हृदय के धरातल पर
उपजा प्रीत अंकुर
पुष्पित हो उठा
तुम्हारी नेह दृष्टि से...
सुवासित हूँ
सराबोर हूँ
इसकी सुगंध में.......
अनभिव्यक्त है
ये मेरा आनन्द
पूर्ण स्वान्तःसुखाय ....
जन्म-मरण
रिश्ते-नातों से विलग
तुम्हारी उपस्थिति
अनुपस्थिति से परे है
ये सुगंध-विलास......
बसी है ये महक
मेरी साँसों में जिस तरह
तुम भी अभिपूरित हो
मुझमें उसी तरह........
जब न रहेंगे हम
ये खुशबू रहेगी तब भी
इसी से महकेंगे
नयी आंखों के सुनहरे सपने
और मासूम दिलों के गीत
फिर एक बार..
और बार-बार......
नाम तुम्हारा बुलाये..
पुरानी है..दूर होते हुए भी
तुम्हें पास महसूसने की आदत
तुम्हारी याद में जागकर
अक्षरों में तुम्हें खोजने की
कोशिश भी नयी नहीं है...
लेकिन विशेष है
शब्दों में खुद को उड़ेलने का क्रम
जो पिछले कुछ दिनों से
चल रहा है अनवरत......
जब-जब मेरी भाषा
उजागर करती है मनःस्थिति
उद्घाटित करती है आशाएँ
अनावृत करती है अपेक्षाएँ
अभिव्यक्त करती है अनुभूतियाँ
प्रदर्शित करती है भावनाएँ
प्रकट करती है अभिलाषाएँ ....
हर बार थोड़ा और
रीत जाता है मन
थोड़ा और रिक्तस्थान
घेर लेते हो तुम....
सुनो न!
ये भाव प्रवाह
अब रोको न,
तुम्हें मुझमें आने से
टोको न.....
कहीं ऐसा न हो
वो दिन भी आए
कोई देखे मुझे और
नाम तुम्हारा बुलाये।
पता सुकूँन का नहीं मिलता..
पता सुकूँन का नहीं मिलता
न बैचेनियों में जान जाती है।
वस्ल की भी सहर नहीं होती
न इंतज़ार की शब आती है।
लफ़्ज़ों हर्फ़ों में बांटने पर भी
दर्द की आंच बुझ न पाती है।
भुला देने की मेरी हर कोशिश
तुम्हें कुछ और पास लाती है।
निर्झर
तुम हो एक निर्झर
निर्दोष,निष्कलुष,निष्क्रमित
कन्दरा की खोह से..
नियति है तुम्हारी
पर्वतों को छोड़
धरातल पर आना..
अस्तित्व और गति के रक्षार्थ
खोज ली राह
पत्थर,पेड़,रेत,माटी में भी..
अथक संघर्षों के बाद
असीमित यात्रा के पश्चात
न हो तुम म्लान
अपनी मंदता और मलिनता पर
कि ये दोष तुम्हारे नहीं
राहजन्य है...
स्मरण रहे के उस छोर पर
स्थायी है तुम्हारी निर्मलता..
मौलिकता और मिश्रण का
विग्रह आता है मुझे
अतः मिलती है विश्रांति
तुम्हारे प्रत्येक रूप में शांति।
Tuesday, 29 August 2017
तुम्हारे लिए
चकमा दे कर
अपने विचारों को
मन की द्वार से लौटा देती हूँ ;
अपने ही आदर्शों को,
निष्कर्षों को बहला लेती हूँ;
मेरी बहुप्रतीक्षित कामनाएँ भी
दहलीज से
वापिस लौट जाती हैं;
माटी के तन में...
छोटे से मन में
चले आये थे तुम
बिना पूछे ही...
तबसे किसी का ही क्यों ...
मेरा भी प्रवेश वर्जित है।
कि अब मुझमें मैं नहीं
तुम जीवित हो।
तुम जब आये थे तो
अपने साथ लाये थे
एक अतृप्त तृषा...
अतृप्त,तृषित मैं
तुम्हें मुझमें समाये
देह-देहांतर भटकती रहूँगी
तुम्हारे लिए।
आवरण
मेरे अनगिनत अपारदर्शी आवरण...
रोक लेते हैं प्रदर्शित होने से..
भूख,भय, क्रोध,हास, घृणा
जैसे कितने वर्जित संवेग।
तृप्ति,बल,क्षमा,सुख,प्रेम
जैसे प्रशसंनीय गुणों की
चित्रकारी है मेरे मुखौटों पर।
छिन्न-भिन्न हो जाती है परतें,
आत्मा सी अनावृत रह जाती हूँ
मैं तुम्हारे सम्मुख...
देख कर अज्ञान,अपूर्णता,
ईर्ष्या,कटुता,निम्नता मेरी...
कैसे कर पाते हो प्रेम मुझे?
कैसे चाह पाते हो ??
कि जानकर तो..
कभी किसी ने भी न चाहा मुझको।
Friday, 25 August 2017
उम्र ने तराशा..
उम्र ने तराशा तो
ढेर लग गया था टूटन का..
ज़ाया नहीं किया इस टूटन को
खींच लिया इस से एक परकोटा सा,
सुरक्षित रहा इसमें
मेरा नया ,झूठा ,नाज़ुक वजूद ..
एक खिड़की से झांकते थे
हँसी,आत्मविश्वास और सुंदरता..
दीवारें ढके रहती थी
उदासी,हीनता और कमजोरियां...
न जाने क्या है तुम्हारी उँगलियों में
कि तुमने छुआ और
भरभरा के ढह गयी सारी परतें..
अनावृत,आज़ाद ,उन्मुक्त
सहज हूँ अब ...
सुनो!
तुम मुझे ऐसे ही छूते रहना।
Tuesday, 22 August 2017
तुम हो..
तुम हो एक निर्झर
निर्दोष,निष्कलुष,निष्क्रमित
कन्दरा की खोह से..
नियति है तुम्हारी
पर्वतों को छोड़
धरातल पर आना..
अस्तित्व और गति के रक्षार्थ
खोज ली राह
पत्थर,पेड़,रेत,माटी में भी..
अथक संघर्षों के बाद
असीमित यात्रा के पश्चात
न हो तुम म्लान
अपनी मंदता और मलिनता पर
कि ये दोष तुम्हारे नहीं
राहजन्य है...
स्मरण रहे के उस छोर पर
स्थायी है तुम्हारी निर्मलता..
मौलिकता और मिश्रण का
विग्रह आता है मुझे
अतः मिलती है विश्रांति
तुम्हारे प्रत्येक रूप में शांति।
Sunday, 20 August 2017
समझदारी..
समझदारी भी
कितनी अजीब चीज़ है..
तुम्हारी समझ
मुझे खींचती है
तुम्हारी ओर
और तुम्हें ले जाती है
मुझसे अलग..
रंग-रूप,गुण-ज्ञान
कोई सम्मोहन भी तो नहीं
जिसकी कैंची से
छांट देती
तुम्हारी समझदारी की
पाप-पुण्य,प्रायश्चित,
आत्मग्लानि की शाखें..
चलो! जाओ
आज़ाद ही रहो मुझसे
विजयी,विश्वासी,सच्चे,सीधे
समझदार ही भाते हो मुझे...
मैं भी आज़ाद हो जाऊंगी तुमसे
जो कभी समझदार हुई।
Saturday, 19 August 2017
कभी तो
वजहें कुछ भी रहें
तुम्हारे पास या मुझमें
रोक सकती हैं तुम्हें ,मुझे नहीं।
मैं तो अगर हूँ
तो रहोगे मुझमें तुम भी।
कसे तारों पे लगा लो सटीक तानें,
बहने दो लम्हे सुर में,
भीग लो मौसमों में अभी,
चमकने दो रातों को चाँदनी में,
रोशन रहने दो जीवन की दिवाली।
जन्म,उम्र,नैतिकता और सुंदरता
के आयाम थक जाएंगे जहाँ
फिर से पूछूँगी तुमसे कि..
अब लिखोगे कुछ सितारे लेकर
अपने आसमान पर मेरा नाम ?
क्या अब तलाश लूँ तुम्हारे हाथों में
वो जगह जहाँ बांधे रहे मुझे ??
सिर रखकर सीने पर अब खोज लूँ
साँसों के सितार में अपने सुर?
सालों सहेजे सावन को क्या
अब उड़ेल दूँ तुम्हारे कंधे पर??
बन जाऊँ अँधेरा और चुन चुन
देती रहूँ गुजरे बीते चमकीले पल?
फिर से पूछूँगी तुमसे
चाहोगे मुझे अब???
बरसों पहले ही
जब रहते थे तुम चुप
और मैं चुपचाप..
इस मौन में रची गईं कितनी कविताएं,
जिन्हें पढ़ सकती थी, समझ सकती थी
केवल मैं ।
कोई और समझेगा भी तो कैसे..
मैंने लिखा कि आने से पहले
आ चुके थे तुम मेरे जीवन में ।
मैंने लिखा कि हवा बन के
समा ली थी तुम्हारी पूरी खुशबू।
मैंने लिखा कि जब चले तुम
तो रास्ते सी बिछी रही मैं ।
मैंने लिखा कि तुम्हारी परछाई को भी
छुपा लिया था मैंने अपनी छाँव में ।
मैंने लिखा कि एक अनजान
के अलावा मैंने कभी कुछ न जाना ।
कैसे निकालेगा कोई अर्थ
मेरी कविता का, कि मैंने लिखा..
तुम्हारी आँखें भटकती है
अभी भी अलभ्य की तलाश में
और इस भटकाव में
ढूढ़ लिया था अपना पता
मैंने .......बरसों पहले ही।
Friday, 18 August 2017
पुनः आरम्भ
सामाजिकता,परिपक्वता
और आदर्शवाद की दृष्टि में
स्वयं के अवलोकन,
समीक्षा और मूल्याङ्कन के लिए
जोड़ती रही अंक...
संस्कारों के,
अच्छाई के,
परोपकार के,
सच्चाई के,
सम्मान के,
चरित्रता के,
प्रेम के,
पवित्रता के,
संयम,
त्याग और
बलिदान के,
नैतिकता,
धर्म और
उत्थान के.....
अंकों के इस गुणा-भाग में
विस्मृत हो गयी हैं मुझसे हासिलें
ज़िद,हठ, चंचलता,रूठने-मनाने की,
मचलने,बहकने ,ठहाके लगाने की...
बहुत उलझ गया है जीवन का गणित..
अधिकतम से अब न्यून होना चाहती हूँ
कि फिर से मैं अब शून्य होना चाहती हूँ।
Thursday, 17 August 2017
दिशा
दूर-दूर तक विस्तरे
संसार सागर ने
खींच लिया था मुझे
अपने भीतर..
इसमें उगे
कानूनों के जंगल ने
भटका दिया था
पूरी तरह....
ढूढ़ कर मुझे
नए सिरे से
गढ़ा है तुमने
तुम्हारे स्पर्श ने
जीवित किया है
मुझको मुझमें
रची है मेरी साँसों में
आशाओं की खुशबू
जगाये है आँखों में स्वप्न
बुनी हैं हृदय में अभिलाषाएं
और देखो न!
इस नए जीवन-दान के
प्रतिदान में देने
कुछ भी नहीं मेरे पास
कल आज और कल
आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...
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कोई तो डोर है जिससे बंधी है उम्मीदें कोई वादा नहीं है फिर भी वास्ता तो है। कभी आये या न आये ये अलग बातें हैं मेरे दिल से उसके दिल तक रास...
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मैं - भीड़ होती जिसमें छुप जाते तुम जब बचना चाहते पहचाने जाने से.. होती एकांत कि मेरी साँसे तक न टकराती तुम्हारे विचारों की आवाजाही मे...
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जब रहते थे तुम चुप और मैं चुपचाप.. इस मौन में रची गईं कितनी कविताएं, जिन्हें पढ़ सकती थी, समझ सकती थी केवल मैं । कोई और समझेगा भी तो कैस...