Monday, 25 June 2018

जीवन कविता का

कविताओं के जीवन के लिए
चाहिए तपती रेत का ढेर
कि जब पानी की फुहार सी गिरे
तो भाप सी निकल पड़े आह

या चाहिए प्यासी मिट्टी
कि सोखते ही शब्दों की बूंदें
सोंधी खुशबू सी उठे संवेदनाएँ

या कोई दरार
कि जहां भर कर रह जाये भाव बरखा
और अंकुरित हो जाये बरसों से छिपा काव्य बीज

न जाने कितनी कविताएँ
बह जाती हैं व्यर्थ
मन के आइने से
और कुछ हठीली ठहर भी जाती हैं
सधी हुई बूंदों की तरह
कांच की सतह पर
अगले किसी पल बह जाने के इंतज़ार में
या फिर कांच की सतह को मिट्टी कर देने की आस में

काला रंग

न शर्म,न अवसाद,न दुश्चिंता का
न अँधेरे का,उदासी का, न कुंठा का
ये जो काला रंग हैं
दुनियां के हर रंग से
अलग,अनोखा,निराला..
ये रंग मिले जब
किसी दूसरे रंग से
तो बना दे उसे और गहरा..
और ज्यादा घुल जाए
तो रंग ले अपने ही रंग।
लेकिन इस पर
नही चढ़ता दूजे किसी
रंग का रंग।
क्यों तुम्हारा मनपसंद रंग भी तो यही है न??

कल आज और कल

आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...