Wednesday, 30 August 2017

निर्झर

तुम हो एक निर्झर
निर्दोष,निष्कलुष,निष्क्रमित
कन्दरा की खोह से..
नियति है तुम्हारी
पर्वतों को छोड़
धरातल पर आना..
अस्तित्व और गति के रक्षार्थ
खोज ली राह
पत्थर,पेड़,रेत,माटी में भी..
अथक संघर्षों के बाद
असीमित यात्रा के पश्चात
न हो तुम म्लान
अपनी मंदता और मलिनता पर
कि ये दोष तुम्हारे नहीं
राहजन्य है...
स्मरण रहे के उस छोर पर
स्थायी है तुम्हारी निर्मलता..
मौलिकता और मिश्रण का
विग्रह आता है मुझे
अतः मिलती है विश्रांति
तुम्हारे प्रत्येक रूप में शांति।

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