Friday, 29 December 2017

जन्मदिन पर

हो सकता है कि आज
घट गए हों कुछ देवदार
पहाड़ों के सीने से
और भीड़ बनकर
दौड़ रहे हों
शहरों की सड़कों पर

कुछ निराशाओं ने
बदल लिया हो उम्मीदों का रूप
और कुछ सपने खो गए हों
पुतलियों की आकाशगंगा में

किसी बेल सा चढ़ा हो
हृदय की दीवारों पर
नए रिश्तों का मोह
और कई यादें उतर गई हों
जहन से बुखार की तरह

लेकिन आज भी
सूरज उसी चमक के साथ उगा
और गुनगुने स्पर्श से सहलाया उसने
हरे मैदानों पर सर्द पड़ी ओस को
बिल्कुल उसी दिन की तरह
जिस दिन तुम दुनिया में आये थे

कितनी भी धुन बदलें उम्र की सरगम
कितना भी बदले जीवन का मौसम
कितनी भी तेज़ भागे घड़ी की सुइयां
लेकिन जिलाये रखना बचपन सी ज़िद
और मन के किसी कोने में अटकाये रखना
नवजात  सी पावनता

नववर्षाभिनंदन

निराश बुजुर्ग वर्ष
अपने नव शिशु वर्ष से....

"तेरे मेरे दादा-परदादा
अब तक सब यह जानते थे
'समय है सबसे बलशाली'
और हम भी यही बात मानते थे

मेरे बाल मन में इच्छा थी
कि अपने इस बल से
रोक सकूंगा नरसंहार
भोली आंखों में आँसू और
अबलाओं पर अत्याचार

मुझे रोटी देनी थी भूख को
ज़मीन पर लाना था रसूख़ को
बेसहारों को हाथ देना था
अकेलेपन को साथ देना था
नफरतों में प्यार बोना था
अमन और शांति में सोना था

जीवन भर कोशिश की
लेकिन मैं अब हार मानता हूँ
मेरा बल आदमी के आगे तो बौना है
पता नहीं कब तक इसको
अपनी पीठ पर हैवानियत ढोना है

सुनो, मेरे नवागन्तुक !
मेरे प्रिय नवबर्ष!
ये मेरे अंतिम दिन हैं
मैं ये सब कर न पाया
इठलाता अपने बल पर
वो अवसर आ न पाया

जाते-जाते अपने सपने
तेरी आँखों को देता हूँ
सच हों और साकार हों ये
बस यही दुआएँ देता हूँ।"

Saturday, 23 December 2017

सफ़र

मेरी सीली मुस्कान खिलती रहे
तुम्हारे नज़र की धूप से..

शामें गुनगुनाती रहें
तुम्हारी बुनी नज़्मों की चादर में..

तुम चाहत के धागे से
रात के आंचल पर
टांकते रहो अपने अरमान
और मेरी पलकें उन्हें चुनती रहें
अपनी बेख्बाब नींदों के लिए..

रात-दिन का ये सफ़र
चलता रहे ऐसे ही..

प्यार हो हर बार हो
तुमसे ही..

प्रेम कविता

तुम्हारी आँखों में जब
धूप सा चमकता है प्रेम
मेरे अंधियारे मन को
सुनहरा रंग देता है

तुम्हारी पलकों में जब
ओस सा छलकता है प्रेम
मेरे ओठों को छूकर
गुलाब कर देता है

तुम्हारी चाहतों को
अपने नेह में गूँथकर
मैंने बाँध लिया है
जीवनद्वार पर बंदनवार सा

अब मेरी हथेलियों पर रखी
तुम्हारी हथेलियों के बीच
बस प्रीत पनपेगी या फिर
अंकुरित होगी कविता

कल आज और कल

आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...