कोई तो डोर है जिससे बंधी है उम्मीदें
कोई वादा नहीं है फिर भी वास्ता तो है।
कभी आये या न आये ये अलग बातें हैं
मेरे दिल से उसके दिल तक रास्ता तो है।
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कल आज और कल
आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...
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कोई तो डोर है जिससे बंधी है उम्मीदें कोई वादा नहीं है फिर भी वास्ता तो है। कभी आये या न आये ये अलग बातें हैं मेरे दिल से उसके दिल तक रास...
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मैं - भीड़ होती जिसमें छुप जाते तुम जब बचना चाहते पहचाने जाने से.. होती एकांत कि मेरी साँसे तक न टकराती तुम्हारे विचारों की आवाजाही मे...
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जब रहते थे तुम चुप और मैं चुपचाप.. इस मौन में रची गईं कितनी कविताएं, जिन्हें पढ़ सकती थी, समझ सकती थी केवल मैं । कोई और समझेगा भी तो कैस...
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