उम्र ने तराशा तो
ढेर लग गया था टूटन का..
ज़ाया नहीं किया इस टूटन को
खींच लिया इस से एक परकोटा सा,
सुरक्षित रहा इसमें
मेरा नया ,झूठा ,नाज़ुक वजूद ..
एक खिड़की से झांकते थे
हँसी,आत्मविश्वास और सुंदरता..
दीवारें ढके रहती थी
उदासी,हीनता और कमजोरियां...
न जाने क्या है तुम्हारी उँगलियों में
कि तुमने छुआ और
भरभरा के ढह गयी सारी परतें..
अनावृत,आज़ाद ,उन्मुक्त
सहज हूँ अब ...
सुनो!
तुम मुझे ऐसे ही छूते रहना।
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