यहाँ
स्वीकृत हैं
अमानवीयता,
क्षम्य है
अत्याचार,
मान्य है
घृणा-द्वेष.....
दबा कर रखना
अपनीआँखों का
छलकता स्नेह,
एकांत में पूंछना
मेरा हाल,
धीरे से करना
प्रीत की बातें
क्योंकि
अस्वीकृत,अक्षम्य,अमान्य है
इस सभ्य,सुसंस्कृत समाज में
श्रद्धा और समर्पण,
आलोचित और बहिष्कृत है
अपनत्व...
कि प्रेम में स्त्रियां
अब राधा,मीरा नहीं
कुछ और कहलाती हैं।
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