अक्सर गुजरी हुई उन तारीखों के पन्ने
न भुलायी जा सकने वाली यादों से भरे होते हैं।
आज खुद को खुद में समेटते हुए
अपने ही थोड़ा और पास आई तो
हृदय वैसे ही लय तोड़ रहा था
जैसे बौरा गया था तुम्हारी पहली छुअन से
आज सिर रखा अपनी ही बाँह पर
लेकिन महक तुम्हारी आई
जलती आँखें बंद की तो पलकों पर
तुम्हारे होठों की ठंडक महसूस हुई
प्रेम न जाने कैसी शै है
कि आँखों से उतरती है मन में
और मन के महसूसते ही
लौटकर आँखों से ही झिरने लगती है
तुम्हें तो बिल्कुल भी पसंद नहीं है न
मेरा बेवक़्त यूँ रो देना..
कि याद आते ही
सारी नमी आँखों से उतर कर गले में आ गयी
रुंधी आवाज़ में तुमसे पूछती हूँ-
सुनो! ऐसे ही सहेजने थे न
'वो लम्हे'???
तुमने कहा था न.. उस शाम
"सम्भाल कर रखना ये पल
ये खूबसूरत समय दुबारा न आएगा।"