Wednesday, 30 August 2017

नाम तुम्हारा बुलाये..

पुरानी है..दूर होते हुए भी
तुम्हें पास महसूसने की आदत
तुम्हारी याद में जागकर
अक्षरों में तुम्हें खोजने की
कोशिश भी नयी नहीं है...
लेकिन विशेष है
शब्दों में खुद को उड़ेलने का क्रम
जो पिछले कुछ दिनों से
चल रहा है अनवरत......
जब-जब मेरी भाषा
उजागर करती है मनःस्थिति
उद्घाटित करती है आशाएँ
अनावृत करती है अपेक्षाएँ
अभिव्यक्त करती है अनुभूतियाँ
प्रदर्शित करती है भावनाएँ
प्रकट करती है अभिलाषाएँ ....
हर बार थोड़ा और
रीत जाता है मन
थोड़ा और रिक्तस्थान
घेर लेते हो तुम....
सुनो न!
ये भाव प्रवाह
अब रोको न,
तुम्हें मुझमें आने से
टोको न.....
कहीं ऐसा न हो
वो दिन भी आए
कोई देखे मुझे और
नाम तुम्हारा बुलाये।

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