सप्रयत्न मुस्कुराहट को
उदासी की प्रतीक्षा है..
बोझिल आँखों को
बरसने की इक्छा है..
घुटन कान लगाए है
मिले ठौर तो बिखर जाये..
मौन ताक में हैं
आवाज बने और बह जाए..
सिमट जाने को है बेकल
एकाकीपन का प्रवाह....
झूठा साहस खोजता है
एक दुर्बलता की थाह..
बरसों से अनवरत
मेरा मुझसे ही उपेक्षित है..
सुनो! कहाँ हो तुम??
तुम्हारा आसरा अपेक्षित है..
कि लोकाचार का बोझ
मुझसे नहीं सहा जाता..
मुझे मेरा होना है अब
और सा नहीं रहा जाता।
Wednesday, 30 August 2017
मुस्कुराहट को..
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