Saturday, 19 August 2017

बरसों पहले ही

जब रहते थे तुम चुप
और मैं चुपचाप..

इस मौन में रची गईं कितनी कविताएं,
जिन्हें पढ़ सकती थी, समझ सकती थी
केवल मैं ।

कोई और समझेगा भी तो कैसे..
मैंने लिखा कि आने से पहले
आ चुके थे तुम मेरे जीवन में ।

मैंने लिखा कि हवा बन के
समा ली थी तुम्हारी पूरी खुशबू।

मैंने लिखा कि जब चले तुम
तो रास्ते सी बिछी रही मैं ।

मैंने लिखा कि तुम्हारी परछाई को भी
छुपा लिया था मैंने अपनी छाँव में ।

मैंने लिखा कि एक अनजान
के अलावा मैंने कभी कुछ न जाना ।

कैसे निकालेगा कोई अर्थ
मेरी कविता का, कि मैंने लिखा..
तुम्हारी आँखें भटकती है
अभी भी अलभ्य की तलाश में
और इस भटकाव में
ढूढ़ लिया था अपना पता
मैंने .......बरसों पहले ही।

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