Wednesday, 30 August 2017

कविता प्रेम पर

विपर्यय सामाजिक दशा को देख
मन में आया
के ऐसे में भी कैसे
लिख पाते हैं लोग प्रेम??
कैसे रच पाते हैं काव्य??
मन के सगे हृदय ने
समझी भाई की बात और कहा-
प्रेम में देह उतनी ही
उपादेय और आकर्षक है
जितना ज्ञान के लिए
विद्यालय में सजाए गये
खिलौने और झूले.......
इनसे खेलना,इनमें झूलना
विद्यालय का उद्देश्य या अंत नहीं
दैहिक आकर्षण/ प्रेम भी
प्रेम का उद्देश्य और अंत नहीं...
प्रेम आरम्भ होना आवश्यक है
क्योंकि यही प्रेम उन्नत होकर
प्राप्त करता है आत्मिक गति,
विकसित करता है अपना स्वरुप..
एक देह से प्रारम्भ होकर
प्रेम समेट लेता है क्रमशः
परिवार,गाँव,देश और
सम्पूर्ण मानव जाति को...
प्रेम का ही विकास
और परावर्तन होता है
कि लोग बन जाते हैं-
बुद्ध,महावीर,भगतसिंह,और टेरेसा...
तो नफरत लिखने से अच्छा है
लिखें प्रेम और बो दें कुछ बीज
सम्भवतः उनमें से निकल आएं
कुछ बट बृक्ष और विश्रांति दें
असंवेदनशीलता और अमानवीयता को।

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