Wednesday, 30 August 2017

तुम्हारा प्रेम

तुम्हारे प्रेम की
धूपिया स्पर्श से
मेरे हृदय के धरातल पर
उपजा प्रीत अंकुर
पुष्पित हो उठा
तुम्हारी नेह दृष्टि से...

सुवासित हूँ
सराबोर हूँ
इसकी सुगंध में.......

अनभिव्यक्त है
ये मेरा आनन्द
पूर्ण स्वान्तःसुखाय ....

जन्म-मरण
रिश्ते-नातों से विलग
तुम्हारी उपस्थिति
अनुपस्थिति से परे है
ये सुगंध-विलास......

बसी है ये महक
मेरी साँसों में जिस तरह
तुम भी अभिपूरित हो
मुझमें उसी तरह........

जब न रहेंगे हम
ये खुशबू रहेगी तब भी
इसी से महकेंगे
नयी आंखों के सुनहरे सपने
और मासूम दिलों के गीत
फिर एक बार..
और बार-बार......

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