Saturday, 23 September 2017

लिख दूँ

जिस्म लिक्खूँ या महज़ दर्द के मानी लिख दूँ
तेरी आमद लिखूँ  या शाम  सुहानी लिख दूँ

जब भी उम्मीद का दामन लगा कि छूट गया
तेरे छू लेने से घड़कन की जवानी लिख दूँ

जिंदगी अब तलक क़ानूनी किताबों सी रही
इश्क़ लिक्खूँ के गुनाहों की कहानी लिख दूँ

दस्तख़त जान के रख लेना तुम मेरे अरमाँ
तेरे होठों पे मुहब्बत की निशानी लिख दूँ

मेरे साजन मेरा हर पल तुझी से रोशन हैं
खुद को मैं रात लिखूँ, रात की रानी लिख दूँ

ख़त्म होता है जहाँ कारोबार लफ्जों का
उसके आगे जो पढ़ो खुद को दीवानी लिख दूँ

Friday, 22 September 2017

तुम्हारा साथ

मेरे साथ तुम्हारा होना..
जैसे ठिठुरती देह को सहलाती धूप
जैसे भभकती लौ को घेरे हथेलियाँ
जैसे थकान भरे दिन के बाद की नींद
या बन्द कमरे में खुला रोशनदान

तुम्हारे साथ मेरा होना..
जैसे फूल की पंखुड़ियों में उतरे रंग
जैसे हवा में घुली ख़स की महक
जैसे आसमान से किसी तारे का टूटना
और आसमान में ही खो जाना।

अमानतें

किताबों के बीच दबा दिए थे कुछ अहसास
थोड़ी सी उम्मीदें बचायी थी मखमली बटुए में
छत की मुडेर पर रख छोड़ी थी अपनी चहक
बारिश की बूंदों में सहेजी थी कुछ शैतानियां
गुलाबी रुमाल में काढ़ा था मौसमों का रेशम
गली के मोड़ पे उड़ गया था गालों का गुलाल...

निठुर,निरमोही समय..सुनो!
जीवन के जिन रास्तों पर
साथ लिए जा रहे हो मुझे
क्या इनका कोई छोर जाकर मिलेगा वहाँ
मेरी उम्र भर की अमानतें रखी हैं जहाँ

Tuesday, 12 September 2017

नया सूरज

पहाड़ों की तलहटी में
मेरे हिस्से की थोड़ी सी ज़मीन पर
मैंने बोया प्रेम,सींचा समर्पण
और उगाये खुशियों के फूल

दोष आंधियों का था
या नदी का..या फिर मिलीभगत दोनों की
उड़ा ले गयी मेरी खुशबू
बहा ले गयी मेरे रंग

कितने मौसम आये और गए
मैं अनछुई अनजान सबसे
बैठकर नदी किनारे बाट जोहती रही
कि कभी लौटा दे जो छीना है मुझसे

भूल गयी थी कि धार नदी की हो या फिर वक़्त की
कभी उल्टी नहीं बहा करती
बह चुका जल और गुजरे हुए पल
लौट कर नहीं आते

नए सूरज ..सुनो..तुम्हारा शुक्रिया
मुझे याद दिलाने के लिए कि
जगह,प्रेम और समर्पण हो तो
उगा सकते हो तुम खुशियों की फसलें
कभी भी

Monday, 4 September 2017

नया अध्याय

विचारों ने,आँखों ने, देह ने
इतनी बार छुआ है मुझे..
कि मेरी संवेदनाएं लहुलुहान हो कर
शरीर पर मृत परतों सी चढ़ी हैं।

संस्कारों ने,विधि ने, विधानों ने
इतनी बार कुचला है मुझे
कि मेरी भावनाएँ चूरमचूर होकर
मन की तलहटी में पड़ी हैं।

नेह ने,प्यार ने ,प्रीत ने
उगाई है जो संजीवनी
तुम्हारे हृदय में..
रिसती है तुम्हारी दृष्टि में,तुम्हारे स्पर्श में...

सुनो! अब जब तुम आओ तो
पूरा देखना, पूरा छूना मुझे..
कि तुम्हारे स्पर्श में ही सजीव होगा
मेरे जीवन का नया अध्याय।

कल आज और कल

आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...