Wednesday, 30 August 2017

प्रेमिकाएं

प्रिय की आवाज सुन कर
तपती ज़मीन पर दौड़ जाती हैं
भूल जाती हैं पैरों की जलन
कि प्रेम में जले को क्या जलन...
भींगती हैं बारिश में
और याद नहीं रहता
भीगने का अहसास
कि प्रेम में तर-बतर को क्या भीगना..
न रुकती हैं रस्मों में
न बंधती हैं रिवाजों में
कोई कैसे कैद कर पाए
कि प्रेम की खुशबू कोई कैसे छुपाये..
प्रेम बना ही देता है
लड़कियों को 'प्रेमिकाएँ'..
और ये प्रेमिकाएँ रख देती हैं
देह के ताप को, भावों के द्रव को
और प्रीत की सुगंध को
गुलाबी कागजों में ,
फूल वाले लिफाफों में बंद कर,
अपने प्रेमियों के लिए......
वो छुपाती हैं अपने प्रेम-पत्र
अलमारियों में,तकियों में
और अक्सर अपनी किताबों में..
वो छुपाती हैं खुद से ही
अपना इतराना ,इठलाना,
छुपाती हैं सबकी निगाहों से
गालों का सुर्ख़ हो जाना,
छुपाती हैं मन का मचल जाना,
छुपाती हैं देह का सुन्दर हो जाना...
प्रेमिकाएँ प्रेम में
लैला या सोहनी हो जाना चाहतीं हैं,
दुनिया के बंधन तोड़ देना चाहती हैं
लेकिन शहर में बदनामी से,
मोहल्ले की अफवाहों से
घर की जग-हंसाई से
माँ-बाप की रुलाई से ही सकुच जाती हैं,
नयी-नयी बनी प्रेमिकाएँ
घर की आंगनों और
कमरे की दीवारों तक ही सिमट जाती हैं..
कभी न भेजे गए अपने प्रेम-पत्र
अपने सीने में दफ़न कर के,
किसी की प्रेमिकाएँ
प्रेम के बारे में पूछने पर
किसी और से कहती हैं-
"प्रेम..न..पहले कभी न हुआ..."
और प्रेम उनके जीवन में
बाद में भी कभी नहीं होता।

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