चकमा दे कर
अपने विचारों को
मन की द्वार से लौटा देती हूँ ;
अपने ही आदर्शों को,
निष्कर्षों को बहला लेती हूँ;
मेरी बहुप्रतीक्षित कामनाएँ भी
दहलीज से
वापिस लौट जाती हैं;
माटी के तन में...
छोटे से मन में
चले आये थे तुम
बिना पूछे ही...
तबसे किसी का ही क्यों ...
मेरा भी प्रवेश वर्जित है।
कि अब मुझमें मैं नहीं
तुम जीवित हो।
तुम जब आये थे तो
अपने साथ लाये थे
एक अतृप्त तृषा...
अतृप्त,तृषित मैं
तुम्हें मुझमें समाये
देह-देहांतर भटकती रहूँगी
तुम्हारे लिए।
Tuesday, 29 August 2017
तुम्हारे लिए
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कल आज और कल
आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...
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