मेरे इन्तजार की सुबह
खोलती है जब
सांझ का संदूक.....
उसमें बंद हसरतों की
बेजान देह पर रखी
मजबूरियों की स्याही
फ़ैल जाती है......
मैं बेचैन अंधेरों को
करारों के रंग से सजाती हूँ..
नया सूरज उगाने के लिए
रात के सीने पर फिर से
उम्मीदों के दिए जलाती हूँ..
No comments:
Post a Comment