Tuesday, 19 May 2020

मेरा होना

मैं -
भीड़ होती
जिसमें छुप जाते तुम
जब बचना चाहते पहचाने जाने से..

होती एकांत
कि मेरी साँसे तक न टकराती
तुम्हारे विचारों की आवाजाही में..

हो सकती पुरवाई
कि जिसके साथ ऊंची बेसुरी आवाज़ में भी
गा सकते लड़कपन के गीत..

वो कोना होती
तकलीफों को कोसते हुए
जहाँ खुलकर रो पाते..

या होती
अपराधों और इच्छाओं की गवाह
मंदिर की आखिरी सीढ़ी..

काश! मैं 'मैं' न होकर
'वो' होती,जिसके होने से
खलल न पड़ता तुम्हारे 'तुम' होने में

कल आज और कल

आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...