सामाजिकता,परिपक्वता
और आदर्शवाद की दृष्टि में
स्वयं के अवलोकन,
समीक्षा और मूल्याङ्कन के लिए
जोड़ती रही अंक...
संस्कारों के,
अच्छाई के,
परोपकार के,
सच्चाई के,
सम्मान के,
चरित्रता के,
प्रेम के,
पवित्रता के,
संयम,
त्याग और
बलिदान के,
नैतिकता,
धर्म और
उत्थान के.....
अंकों के इस गुणा-भाग में
विस्मृत हो गयी हैं मुझसे हासिलें
ज़िद,हठ, चंचलता,रूठने-मनाने की,
मचलने,बहकने ,ठहाके लगाने की...
बहुत उलझ गया है जीवन का गणित..
अधिकतम से अब न्यून होना चाहती हूँ
कि फिर से मैं अब शून्य होना चाहती हूँ।
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