पता सुकूँन का नहीं मिलता न बैचेनियों में जान जाती है।
वस्ल की भी सहर नहीं होती न इंतज़ार की शब आती है।
लफ़्ज़ों हर्फ़ों में बांटने पर भी दर्द की आंच बुझ न पाती है।
भुला देने की मेरी हर कोशिश तुम्हें कुछ और पास लाती है।
आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...
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