Wednesday, 30 August 2017

पता सुकूँन का नहीं मिलता..

पता सुकूँन का नहीं मिलता
न बैचेनियों में जान जाती है।

वस्ल की भी सहर नहीं होती
न इंतज़ार की शब आती है।

लफ़्ज़ों हर्फ़ों में बांटने पर भी
दर्द की आंच बुझ न पाती है।

भुला देने की मेरी हर कोशिश
तुम्हें कुछ और पास लाती है।

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