Wednesday, 30 August 2017

ज़िन्दगी की किताब

ये कुछ नर्म,नाजुक,मासूम से ,
किलकता है इनमें बचपन मेरा..

शोख,महकते,लरजते हैं जो,
इनमें धड़कती है जवानी मेरी..

धुले-धुले,नम से हैं ये जो कुछ,
हिज्र की स्याही से लिखे गये हैं..

बेजान,कटे-फटे,बिखरे हैं ये ,
दुनियादारी की मार है इन पर...

वक़्त ने भर दिए  हैं  इतने पन्ने,
जिंदगी की किताब में अब तक..

आखिरी जो दो-चार बचे हैं कोरे,
तुम्हारी लिखावट के इंतज़ार में हैं।

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