ये कुछ नर्म,नाजुक,मासूम से ,
किलकता है इनमें बचपन मेरा..
शोख,महकते,लरजते हैं जो,
इनमें धड़कती है जवानी मेरी..
धुले-धुले,नम से हैं ये जो कुछ,
हिज्र की स्याही से लिखे गये हैं..
बेजान,कटे-फटे,बिखरे हैं ये ,
दुनियादारी की मार है इन पर...
वक़्त ने भर दिए हैं इतने पन्ने,
जिंदगी की किताब में अब तक..
आखिरी जो दो-चार बचे हैं कोरे,
तुम्हारी लिखावट के इंतज़ार में हैं।
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