एक लंबे अरसे बाद जब मैं
पेंसिल रंग और ब्रश उठाउंगी
तो सबसे पहले संवारूंगी
अपने ही जीवन का चित्र
जब मैं खुद बनूंगी चित्रकार
तो नहीं छोडूंगी
अपनी हथेलियों के जैसी
आड़ी -टेढ़ी और अधूरी लकीरें
आजाद कर दूंगी
गहरी काली परिधियों में
बरसों से क़ैद रहे
अहसासों के सभी रंगों को
कुछ आसमानी बातें
ज़मीन पर उकेरी जाएंगी
कुछ कड़वी सच्चाइयां
समंदर के नीले हरे रंग में ढक दी जाएंगी
रेतीला भूरापन हटाकर
धरती पर गिराऊँगी
कुछ और धानी हरा रंग
सजाऊंगी कुछ और फूल तितलियां
मौसमों को तो मैं रहने दूँगी
ऐसे ही कच्चे रंगों में
कि अच्छी लगती है मुझे
एक के बाद एक आती जाती ऋतुएँ
लेकिन बहुत पक्के रंग से रंग दूँगी
इंसान और इंसानी रिश्ते
कि इनके रंग बदलने और रंग उतरने से
सबसे ज़्यादा बदरंग होती है ज़िन्दगी