Saturday, 17 July 2021

चित्रकारी

एक लंबे अरसे बाद जब मैं 
पेंसिल रंग और ब्रश उठाउंगी
तो सबसे पहले संवारूंगी
अपने ही जीवन का चित्र 

जब मैं खुद बनूंगी चित्रकार
तो नहीं छोडूंगी 
अपनी हथेलियों के जैसी 
आड़ी -टेढ़ी और अधूरी लकीरें 

आजाद कर दूंगी
गहरी काली परिधियों में
बरसों से क़ैद रहे
अहसासों के सभी रंगों को

कुछ आसमानी बातें 
ज़मीन पर उकेरी जाएंगी
कुछ कड़वी सच्चाइयां 
समंदर के नीले हरे रंग में ढक दी जाएंगी

रेतीला भूरापन हटाकर
धरती पर गिराऊँगी
कुछ और धानी हरा रंग
सजाऊंगी कुछ और फूल तितलियां

मौसमों को तो मैं रहने दूँगी
ऐसे ही कच्चे रंगों में
कि अच्छी लगती है मुझे
एक के बाद एक आती जाती ऋतुएँ

लेकिन बहुत पक्के रंग से रंग दूँगी
इंसान और इंसानी रिश्ते
कि इनके रंग बदलने और रंग उतरने से
सबसे ज़्यादा बदरंग होती है ज़िन्दगी

कल आज और कल

आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...