समझदारी भी
कितनी अजीब चीज़ है..
तुम्हारी समझ
मुझे खींचती है
तुम्हारी ओर
और तुम्हें ले जाती है
मुझसे अलग..
रंग-रूप,गुण-ज्ञान
कोई सम्मोहन भी तो नहीं
जिसकी कैंची से
छांट देती
तुम्हारी समझदारी की
पाप-पुण्य,प्रायश्चित,
आत्मग्लानि की शाखें..
चलो! जाओ
आज़ाद ही रहो मुझसे
विजयी,विश्वासी,सच्चे,सीधे
समझदार ही भाते हो मुझे...
मैं भी आज़ाद हो जाऊंगी तुमसे
जो कभी समझदार हुई।
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