मेरे अनगिनत अपारदर्शी आवरण...
रोक लेते हैं प्रदर्शित होने से..
भूख,भय, क्रोध,हास, घृणा
जैसे कितने वर्जित संवेग।
तृप्ति,बल,क्षमा,सुख,प्रेम
जैसे प्रशसंनीय गुणों की
चित्रकारी है मेरे मुखौटों पर।
छिन्न-भिन्न हो जाती है परतें,
आत्मा सी अनावृत रह जाती हूँ
मैं तुम्हारे सम्मुख...
देख कर अज्ञान,अपूर्णता,
ईर्ष्या,कटुता,निम्नता मेरी...
कैसे कर पाते हो प्रेम मुझे?
कैसे चाह पाते हो ??
कि जानकर तो..
कभी किसी ने भी न चाहा मुझको।
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