मासूमियत की धूल
समझदारी की छुअन से
अक्लमंदी के पत्थरों में बदलकर
आदर्शों का पहाड़ बन जाती है
और संवेदनाएँ इस पहाड़ पर जमी बर्फ
मान-सम्मान के पदचिन्ह समेटे
मर्यादा का कोहरा ओढ़े
बरसों-बरस
पत्थर सी पड़ी रहती है बर्फ
पत्थरों पर
सुनो! सूरज..
इसकी देह पर मलो न
अपने प्रेम की धूप
आकाश के सन्नाटों और
ऊंचाइयों के अकेलेपन को परे धकेल
ये बर्फ बह निकले नदी बनकर
कि मन के मैदान बंजर हुए जाते हैं