Tuesday, 31 October 2017

बर्फ

मासूमियत की धूल
समझदारी की छुअन से
अक्लमंदी के पत्थरों में बदलकर
आदर्शों का पहाड़ बन जाती है
और संवेदनाएँ इस पहाड़ पर जमी बर्फ

मान-सम्मान के पदचिन्ह समेटे
मर्यादा का कोहरा ओढ़े
बरसों-बरस
पत्थर सी पड़ी रहती है बर्फ
पत्थरों पर

सुनो! सूरज..
इसकी देह पर मलो न
अपने प्रेम की धूप
आकाश के सन्नाटों और
ऊंचाइयों के अकेलेपन को परे धकेल
ये बर्फ बह निकले नदी बनकर

कि मन के मैदान बंजर हुए जाते हैं

Friday, 27 October 2017

स्त्री

मैं धरती हूँ
मेरे ऊपर बना लिए अहंकार के महल

मैं पानी हूँ
मुझे भर लिया ज़रूरतों के मर्तबानों में

मैं आग हूँ
बुझा दिया मुझे नैतिकता के अर्ध्य देकर

मैं आकाश हूँ
समेट दिया मुझे परम्पराओं की दहलीज तक

मैं हवा हूँ
मुझे बांध दिया नामज़द साँसों के साथ

समाज को जोड़ने
सम्बन्धों को समेटने
मर्यादाओं को सहेजने के गर्व से
टूटकर,सिमटकर, सहमकर भी
मुझे भर जाना था पूर्णता के अहसास से
क्योंकि स्त्री हूँ मैं

समानता,प्रेम,सम्मान स्वाभिमान की
अपूरित खाई पर सजाया गया
महानता का मुकुट हटाकर देखो न

आखिरी छोर तक हरा-भरा हो कर
समंदर की तरह बनकर अथाह
फैलकर अनंत दिशाओं में रोशनी बनकर
अनहद होकर आसमां की तरह
बिखरकर खुशबू की तरह
पूर्ण होती हूँ मैं

कि देवी नहीं
स्त्री हूँ मैं

Friday, 6 October 2017

प्रेम कविता

मेरे चेहरे पर
न जाने कितनी नज़्में रचती है
तुम्हारी नज़र
मेरे होठों
कितनी ही गज़लें उकेरती है
तुम्हारी मुस्कुराहट

नेह से झलकी तुम्हारी आँखों से
नमी सोखकर नरम हुए मेरे मन पर
और गहरी उभरती है
तुम्हारी प्रीत की लिखावट

कैसे और कितने रंग हैं तुम्हारे पास
कि जब भी कभी छूते हो मुझे
भावनाओं का भंवर उठता है
और डुबो लेता है मुझे

तुम्हे आती हैं
प्रेम की अनगिनत भाषाएँ
बुन देते हो हर पल कुछ नया
और मैं उलझती जाती हूँ
अबूझ अक्षरों के ताने-बाने में

सुनो मेरे मीत !
अबके जो उलझाओ तो ऐसे
कि विधना भी सुलझाना चाहे
तो जन्मों जन्म ढूँढता रहे
इस बन्धन के सिरे
और मैं निश्चिंत हो लिखती रहूँ
तुम्हारे सीने पर
अपनी उँगलियों से
रोज एक नई प्रेम कविता !

Wednesday, 4 October 2017

सामने तुम हो तो ऐसा लगता है
जागती आँखों में सपना कोई मचलता है।

वक़्त कुछ ख़ास है कि इसका हर लम्हा
तेरे आगोश में पिघलता है।

ये साँसें मुंतजिर हो जैसे सदियों से
तेरी साँसों में ऐसे घुली जाती हैं।

अनकही बातों की कितनी परतें
तेरी नज़रों से खुली जाती हैं।

करीब इतने हैं कि अपनी धड़कन
तेरे सीने में सुन सकती हूँ।

तुम्हारे इश्क़ की  हरारत से
जिंदगी नए सिरे से बुन सकती हूँ।












कल आज और कल

आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...