Friday, 22 September 2017

अमानतें

किताबों के बीच दबा दिए थे कुछ अहसास
थोड़ी सी उम्मीदें बचायी थी मखमली बटुए में
छत की मुडेर पर रख छोड़ी थी अपनी चहक
बारिश की बूंदों में सहेजी थी कुछ शैतानियां
गुलाबी रुमाल में काढ़ा था मौसमों का रेशम
गली के मोड़ पे उड़ गया था गालों का गुलाल...

निठुर,निरमोही समय..सुनो!
जीवन के जिन रास्तों पर
साथ लिए जा रहे हो मुझे
क्या इनका कोई छोर जाकर मिलेगा वहाँ
मेरी उम्र भर की अमानतें रखी हैं जहाँ

No comments:

Post a Comment

कल आज और कल

आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...