विचारों ने,आँखों ने, देह ने
इतनी बार छुआ है मुझे..
कि मेरी संवेदनाएं लहुलुहान हो कर
शरीर पर मृत परतों सी चढ़ी हैं।
संस्कारों ने,विधि ने, विधानों ने
इतनी बार कुचला है मुझे
कि मेरी भावनाएँ चूरमचूर होकर
मन की तलहटी में पड़ी हैं।
नेह ने,प्यार ने ,प्रीत ने
उगाई है जो संजीवनी
तुम्हारे हृदय में..
रिसती है तुम्हारी दृष्टि में,तुम्हारे स्पर्श में...
सुनो! अब जब तुम आओ तो
पूरा देखना, पूरा छूना मुझे..
कि तुम्हारे स्पर्श में ही सजीव होगा
मेरे जीवन का नया अध्याय।
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