Saturday, 23 September 2017

लिख दूँ

जिस्म लिक्खूँ या महज़ दर्द के मानी लिख दूँ
तेरी आमद लिखूँ  या शाम  सुहानी लिख दूँ

जब भी उम्मीद का दामन लगा कि छूट गया
तेरे छू लेने से घड़कन की जवानी लिख दूँ

जिंदगी अब तलक क़ानूनी किताबों सी रही
इश्क़ लिक्खूँ के गुनाहों की कहानी लिख दूँ

दस्तख़त जान के रख लेना तुम मेरे अरमाँ
तेरे होठों पे मुहब्बत की निशानी लिख दूँ

मेरे साजन मेरा हर पल तुझी से रोशन हैं
खुद को मैं रात लिखूँ, रात की रानी लिख दूँ

ख़त्म होता है जहाँ कारोबार लफ्जों का
उसके आगे जो पढ़ो खुद को दीवानी लिख दूँ

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