Tuesday, 12 September 2017

नया सूरज

पहाड़ों की तलहटी में
मेरे हिस्से की थोड़ी सी ज़मीन पर
मैंने बोया प्रेम,सींचा समर्पण
और उगाये खुशियों के फूल

दोष आंधियों का था
या नदी का..या फिर मिलीभगत दोनों की
उड़ा ले गयी मेरी खुशबू
बहा ले गयी मेरे रंग

कितने मौसम आये और गए
मैं अनछुई अनजान सबसे
बैठकर नदी किनारे बाट जोहती रही
कि कभी लौटा दे जो छीना है मुझसे

भूल गयी थी कि धार नदी की हो या फिर वक़्त की
कभी उल्टी नहीं बहा करती
बह चुका जल और गुजरे हुए पल
लौट कर नहीं आते

नए सूरज ..सुनो..तुम्हारा शुक्रिया
मुझे याद दिलाने के लिए कि
जगह,प्रेम और समर्पण हो तो
उगा सकते हो तुम खुशियों की फसलें
कभी भी

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