Friday, 29 December 2017

जन्मदिन पर

हो सकता है कि आज
घट गए हों कुछ देवदार
पहाड़ों के सीने से
और भीड़ बनकर
दौड़ रहे हों
शहरों की सड़कों पर

कुछ निराशाओं ने
बदल लिया हो उम्मीदों का रूप
और कुछ सपने खो गए हों
पुतलियों की आकाशगंगा में

किसी बेल सा चढ़ा हो
हृदय की दीवारों पर
नए रिश्तों का मोह
और कई यादें उतर गई हों
जहन से बुखार की तरह

लेकिन आज भी
सूरज उसी चमक के साथ उगा
और गुनगुने स्पर्श से सहलाया उसने
हरे मैदानों पर सर्द पड़ी ओस को
बिल्कुल उसी दिन की तरह
जिस दिन तुम दुनिया में आये थे

कितनी भी धुन बदलें उम्र की सरगम
कितना भी बदले जीवन का मौसम
कितनी भी तेज़ भागे घड़ी की सुइयां
लेकिन जिलाये रखना बचपन सी ज़िद
और मन के किसी कोने में अटकाये रखना
नवजात  सी पावनता

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