निराश बुजुर्ग वर्ष
अपने नव शिशु वर्ष से....
"तेरे मेरे दादा-परदादा
अब तक सब यह जानते थे
'समय है सबसे बलशाली'
और हम भी यही बात मानते थे
मेरे बाल मन में इच्छा थी
कि अपने इस बल से
रोक सकूंगा नरसंहार
भोली आंखों में आँसू और
अबलाओं पर अत्याचार
मुझे रोटी देनी थी भूख को
ज़मीन पर लाना था रसूख़ को
बेसहारों को हाथ देना था
अकेलेपन को साथ देना था
नफरतों में प्यार बोना था
अमन और शांति में सोना था
जीवन भर कोशिश की
लेकिन मैं अब हार मानता हूँ
मेरा बल आदमी के आगे तो बौना है
पता नहीं कब तक इसको
अपनी पीठ पर हैवानियत ढोना है
सुनो, मेरे नवागन्तुक !
मेरे प्रिय नवबर्ष!
ये मेरे अंतिम दिन हैं
मैं ये सब कर न पाया
इठलाता अपने बल पर
वो अवसर आ न पाया
जाते-जाते अपने सपने
तेरी आँखों को देता हूँ
सच हों और साकार हों ये
बस यही दुआएँ देता हूँ।"
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