तुम्हारी आँखों में जब
धूप सा चमकता है प्रेम
मेरे अंधियारे मन को
सुनहरा रंग देता है
तुम्हारी पलकों में जब
ओस सा छलकता है प्रेम
मेरे ओठों को छूकर
गुलाब कर देता है
तुम्हारी चाहतों को
अपने नेह में गूँथकर
मैंने बाँध लिया है
जीवनद्वार पर बंदनवार सा
अब मेरी हथेलियों पर रखी
तुम्हारी हथेलियों के बीच
बस प्रीत पनपेगी या फिर
अंकुरित होगी कविता
No comments:
Post a Comment