Saturday, 23 December 2017

सफ़र

मेरी सीली मुस्कान खिलती रहे
तुम्हारे नज़र की धूप से..

शामें गुनगुनाती रहें
तुम्हारी बुनी नज़्मों की चादर में..

तुम चाहत के धागे से
रात के आंचल पर
टांकते रहो अपने अरमान
और मेरी पलकें उन्हें चुनती रहें
अपनी बेख्बाब नींदों के लिए..

रात-दिन का ये सफ़र
चलता रहे ऐसे ही..

प्यार हो हर बार हो
तुमसे ही..

No comments:

Post a Comment

कल आज और कल

आज जबकि महीनों तुम्हें बिना देखे गुजर जाते हैं हफ्तों तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती पहरों तुम्हारे पास मेरे लिए कोई शब्द नहीं होते कल के लिए...