मेरे चेहरे पर
न जाने कितनी नज़्में रचती है
तुम्हारी नज़र
मेरे होठों
कितनी ही गज़लें उकेरती है
तुम्हारी मुस्कुराहट
नेह से झलकी तुम्हारी आँखों से
नमी सोखकर नरम हुए मेरे मन पर
और गहरी उभरती है
तुम्हारी प्रीत की लिखावट
कैसे और कितने रंग हैं तुम्हारे पास
कि जब भी कभी छूते हो मुझे
भावनाओं का भंवर उठता है
और डुबो लेता है मुझे
तुम्हे आती हैं
प्रेम की अनगिनत भाषाएँ
बुन देते हो हर पल कुछ नया
और मैं उलझती जाती हूँ
अबूझ अक्षरों के ताने-बाने में
सुनो मेरे मीत !
अबके जो उलझाओ तो ऐसे
कि विधना भी सुलझाना चाहे
तो जन्मों जन्म ढूँढता रहे
इस बन्धन के सिरे
और मैं निश्चिंत हो लिखती रहूँ
तुम्हारे सीने पर
अपनी उँगलियों से
रोज एक नई प्रेम कविता !
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