Friday, 27 October 2017

स्त्री

मैं धरती हूँ
मेरे ऊपर बना लिए अहंकार के महल

मैं पानी हूँ
मुझे भर लिया ज़रूरतों के मर्तबानों में

मैं आग हूँ
बुझा दिया मुझे नैतिकता के अर्ध्य देकर

मैं आकाश हूँ
समेट दिया मुझे परम्पराओं की दहलीज तक

मैं हवा हूँ
मुझे बांध दिया नामज़द साँसों के साथ

समाज को जोड़ने
सम्बन्धों को समेटने
मर्यादाओं को सहेजने के गर्व से
टूटकर,सिमटकर, सहमकर भी
मुझे भर जाना था पूर्णता के अहसास से
क्योंकि स्त्री हूँ मैं

समानता,प्रेम,सम्मान स्वाभिमान की
अपूरित खाई पर सजाया गया
महानता का मुकुट हटाकर देखो न

आखिरी छोर तक हरा-भरा हो कर
समंदर की तरह बनकर अथाह
फैलकर अनंत दिशाओं में रोशनी बनकर
अनहद होकर आसमां की तरह
बिखरकर खुशबू की तरह
पूर्ण होती हूँ मैं

कि देवी नहीं
स्त्री हूँ मैं

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