Wednesday, 4 October 2017

सामने तुम हो तो ऐसा लगता है
जागती आँखों में सपना कोई मचलता है।

वक़्त कुछ ख़ास है कि इसका हर लम्हा
तेरे आगोश में पिघलता है।

ये साँसें मुंतजिर हो जैसे सदियों से
तेरी साँसों में ऐसे घुली जाती हैं।

अनकही बातों की कितनी परतें
तेरी नज़रों से खुली जाती हैं।

करीब इतने हैं कि अपनी धड़कन
तेरे सीने में सुन सकती हूँ।

तुम्हारे इश्क़ की  हरारत से
जिंदगी नए सिरे से बुन सकती हूँ।












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