अलगनी पर टंगे
रेशमी कोरे अंगोछे सा था मेरा मन
लोग आए स्वार्थ से सने हाथ पोंछे
और चल दिए
हर बार नमी के साथ
कुछ रेशे चिपक कर चले जाने से
तार-तार हो गये पटके को
सूती धागों की रफूग़री ने समेट तो लिया
लेकिन नरमियत थी
जो वापिस न लौटी
सुनो! तुमने इसे उतारकर
डाल तो लिया है अपने कांधे पर
लेकिन संभाल कर रखना
मेरे मन का बचा हुआ एक चौथाई रेशम
कि इससे ज़्यादा रुखाई में साँसें उलझती है मेरी
Sunday, 21 January 2018
मन
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