सुनो न!
क्यों न हम चलें कहीं दूर
इतनी दूर कि जहाँ
यादें भी छू न पाएँ हमें
यादें...गुजरे कल की
बहुरूपिये समाज की
खोखली नैतिकताओं की
बेबजह वर्जनाओं की
यादें..रिश्तों-नातों की
जिन्हें थामे रहने की कोशिश में
फिसल गई डोर सपनों की
खो गयी राह खुशियों की
यादें..अपने अपनों की
जिनकी उपेक्षा मिट्टी डालती रही
प्रेम और अपनत्व की भूख से
दम तोड़ती भावनाओं पर
सुनो! क्यों न उपेक्षित हम
रौंदतें हुए सारी लक्ष्मण रेखाएं
पार करते हुए सारी दहलीजें
ठुकरा डालें ये ओछी दुनिया
हाँ, क्यों नहीं..चलो न
मूँद कर अपनी आँखें खो जाएँ एक दूसरे में
कि हमारे दिलों से बेहतर
हमारे लिए कोई और जगह नहीं
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