कविताओं के जीवन के लिए
चाहिए तपती रेत का ढेर
कि जब पानी की फुहार सी गिरे
तो भाप सी निकल पड़े आह
या चाहिए प्यासी मिट्टी
कि सोखते ही शब्दों की बूंदें
सोंधी खुशबू सी उठे संवेदनाएँ
या कोई दरार
कि जहां भर कर रह जाये भाव बरखा
और अंकुरित हो जाये बरसों से छिपा काव्य बीज
न जाने कितनी कविताएँ
बह जाती हैं व्यर्थ
मन के आइने से
और कुछ हठीली ठहर भी जाती हैं
सधी हुई बूंदों की तरह
कांच की सतह पर
अगले किसी पल बह जाने के इंतज़ार में
या फिर कांच की सतह को मिट्टी कर देने की आस में
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