मौसम बदल भी जाये
हर शाख नहीं हरयाती
कभी कहीं कम पड़ जाता है
पतझड़ की चोट पर वसंत का फाहा ।
खंडहरों में दिया जलाकर भी
उनमें प्राण नहीं लौटते
कि रोशनी अंधेरे तो मिटा देती है
वीरानगी नहीं।
ठंड को क्या उलाहना
कि जड़ कर दिया मन
पत्थर में बदलते देखता रहा
मुझे शिकायत प्रेम से है।
रतजगों से ही नहीं
कभी कभो नींद से भी बोझिल हो जाती हैं आँखें
अधूरे सपनों की किरंचें
उनींदेपन से ज़्यादा चुभती हैं ।
Saturday, 19 February 2022
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