Saturday, 19 February 2022

मौसम बदल भी जाये
हर शाख नहीं हरयाती
कभी कहीं कम पड़ जाता है
पतझड़ की चोट पर वसंत का फाहा ।

खंडहरों में दिया जलाकर भी
उनमें प्राण नहीं लौटते
कि रोशनी अंधेरे तो मिटा देती है
वीरानगी नहीं।

ठंड को क्या उलाहना
कि जड़ कर दिया मन
पत्थर में बदलते देखता रहा
मुझे शिकायत प्रेम से है।

रतजगों से ही नहीं
कभी कभो नींद से भी बोझिल हो जाती हैं आँखें
अधूरे सपनों की किरंचें
उनींदेपन से ज़्यादा चुभती हैं ।

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