Sunday, 17 January 2021

कोई तो रास्ता देखे किसी को याद आये
कोई तो शाम हो ऐसी कोई सहर आये

न सीखा झूठ न फरेब न ही पर्दादारी
हमें कभी न जमाने के रंग ढंग आये

हर एक पेंच में उलझे हैं हर दफ़ा हारे
ज़िंदगी ज़िंदगी खेलके हम तंग आये

न रंग न खुशबू न उजालों की सिफ़त
किस उम्मीद में कोई हमारे संग आये

वो अपने जोग ज्ञान ध्यान से नहीं उबरा
कभी रंगरेज पे न ओढ़नी के रंग आये

नींद अक्सर ही आंसुओं से गीली रही
डर यही है के तेरे ख्बाब पे न जंग आये

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